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नागरिक सुरक्षा

          भारत में नागरिक सुरक्षा की अवधारणा का उद्भव द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान स्थापित एयर रेड प्रिकॉशन्स समिति से हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य युद्धकालीन संकट के दौरान नागरिकों के जीवन और संपत्ति की रक्षा करना तथा उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों की निरंतरता बनाए रखना था। अक्टूबर 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान भारतीय शहरों पर हवाई हमलों से हुई भारी जनहानि और संपत्ति के नुकसान को देखते हुए, भारत सरकार ने नवंबर 1962 में नागरिक सुरक्षा विभाग की स्थापना के लिए अधिसूचना जारी की। इसके पश्चात, राजस्थान सरकार ने 13 नवंबर 1962 को अधिसूचना जारी कर, राज्य के 12 सीमावर्ती शहरों में नागरिक सुरक्षा इकाइयों की स्थापना की, जो हवाई हमलों (बाहरी आक्रमण) से प्रभावित हो सकते थे।

        नागरिक सुरक्षा संगठन ने वर्ष 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान सक्रिय भूमिका निभाई तथा प्रभावी खोज एवं बचाव अभियानों के माध्यम से राज्य में जनहानि और संपत्ति के नुकसान को कम करने में सराहनीय सहयोग दिया। वर्ष 2001 में गुजरात भूकंप और वर्ष 2004 में दक्षिणी राज्यों में आई सुनामी के कारण देश में हुई जनहानि और संपत्ति के नुकसान, साथ ही प्राकृतिक और मानव-जनित आपदाओं की बढ़ती घटनाओं को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने वर्ष 2005 में आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू किया। हवाई हमलों और आपदाओं की स्थिति में नागरिक सुरक्षा विभाग के आपदा प्रबंधन प्रशिक्षित अधिकारियों/कर्मचारियों/स्वयंसेवकों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए, भारत सरकार ने वर्ष 2009 में नागरिक सुरक्षा अधिनियम, 1968 में आंशिक संशोधन कर नागरिक सुरक्षा विभाग को आपदा प्रबंधन सम्बन्धी महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी।

        27 जुलाई 2015 को, राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना जारी कर नागरिक सुरक्षा विभाग को होम गार्ड विभाग से पृथक कर, आपदा प्रबंधन एवं सहायता विभाग के अधीन कर दिया गया। दिनांक 12 जुलाई 2017 में, राज्य के सभी जिलों को नागरिक सुरक्षा जिला घोषित किया गया, जिससे नागरिक सुरक्षा का कार्यक्षेत्र शहरी सीमाओं से बढ़कर पूरे जिले तक विस्तारित हो गया। इस प्रकार, राजस्थान देश का पहला राज्य बन गया, जिसने राज्य के सभी जिलों में नागरिक सुरक्षा इकाइयों की स्थापना और सक्रियता सुनिश्चित की।